हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हायियो का शिकार आदमी
सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
अपनी ही लाश का खुद मज़ार आदमी
हर तरफ भागते दौड़ते रास्ते…
हर तरफ आदमी का शिकार आदमी
रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ
हर नए दिन, नया इंतज़ार आदमी
ज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र-दर-सफ़र
आखिरी साँस तक बेक़रार आदमी
– निदा फाजली
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Sahi bat hai……